मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ

(फोटो गूगल से साभार)

चलो दो चार किस्से बतियाता चलूँ
जिंदगी को गुनगुनाता चलूँ 
तबियत में उतार चढ़ाव लाजिमी है 
जरा तबियत से उसे गले लगाता चलूँ 

हसरतें कई बह जाती हैं
रेतीली लहरों के साथ साथ 
उम्मीदें कई उड़ जाती हैं
बहती हवाओं के साथ 
पर मजबूर हूँ दिल से ए जिंदगी
मुस्कुराने की आदत है, मुस्कुराता चलूँ
हसरतों का कारवां फिर बनाता चलूँ 

कोरे कागज़ पर लिख कर 
क्यूँ फेंक दे फिर उसे मोड़ माड़ कर 
तल्खियां रिश्तों में आम है
क्या मिला है बगिया उजाड़ कर  
उड़ाने और लपेटने का पतंग
सिलसिला ये लाजवाब है
रिश्तों को संभालना जो सीख ले
वो दुनिया में बेमिसाल है
अपनापन सा कुछ मिठास मिलाता चलूँ
रिश्ता इंसानियत का और बनाता चलूँ 

बिखरना और टूटना मानता हूँ
पर टूट कर जुड़ना भी जानता हूँ
अमावस का आना तय है हर महीने
ख्याल में पूणर्मासी के रातें गुजारता हूँ 
सीखने को बहुत कुछ है जिंदगी में
पर ढाई आखर की महता पहचानता हूँ 
हैं अंधेरों से बातें करती कई राहें
उन राहों पर दीप जलाता चलूँ 
जिंदगी तुम बहुत खूबसूरत हो
चलो तुम्हें तुम्हारा दीदार कराता चलूँ 



सोमवार, 28 अगस्त 2017

जमाना जिसके लिए आज मूक बधिर है

(फोटो गूगल से साभार)

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है 

गड्ढे हैं आँखों के नीचे
उन गड्ढों में तैरता 
कोई छंद है 
आँखों से निकल कर 
एक कविता बह रही है 
फटे चीटे कपड़े बदन पर
दिल में कोई जख्म है, पीर है
शाम की विश्राम करती राहों पर
चल रहा कोई फ़कीर है

अँधेरा होने को है 
चाँद निकाला है उसने
अपने बाईं तरफ वाली 
ऊपरी जेब से
रख लिया है हाथों में
दर्द की तनहा रातों में 
गीत गाता हुआ
तोड़ रहा  
ख़ामोशी की जंजीर है 
पर ना जाने क्यूँ  
जमाना जिसके लिए 
आज मूक बधिर है 

हाथ में एक तस्वीर है
चेहरे पर जिसके 
आरी तिरछी लकीर है !

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